खुश्बू 

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ये दिल्ली थी मेरी जान 

धुँआ धुँआ सा आसमान ,

धुँआ धुँआ सी ज़मीं,

धुँध सी छाई हर तरफ,

किसी को कुछ फिक्र ही नही।

मासूम बचपन की आँखों से पानी बरसा,

मजबूर बुढापा एक एक साँस को तरसा,

क्या से क्या बना डाला इस शहर को,

दावत दे दी,आपदाओं और कहर को।

ये दिल्ली थी मेरी जान,

आज विषैले प्रदूषण की भेंट चढ़ी, 

राजनीती,वादों..बयान, इरादों के खेल मे,

कमज़ोर खिलाड़ी सी अपनी साख बचाने को अड़ी।

वक्त रहते सम्भल जाओ हुजूर, 

दिलवालों के शहर मे किसका क्या कसूर,

जहर को फैलने से रोक लो जरा, 

छलनी ना हो जाए कहीं देश का गुरूर।

© रंजीता अशेष

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Positivity reloaded 

My new youtube channel…hip hip hurray😆

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मुझे बहने दो 

नदी नही एक झरना मैं,

आशा दिल मे रखता मैं,

आगे बढूँ,बढ़ता चलूँ,

सामने एक राह हो,

उस पर मुझे चलने दो,

बहना है मुझे बहने दो।

कई रूकावट आती हैं,

राह मेरा रोक जाती हैं,

छोटा हूँ ना,कर भी क्या सकता हूँ,

हाँ और हार भी नही माँगता हूँ,

बस मुझे हर मुश्किल से लड़ने दो,

बहना है मुझे बहने दो।

चाहता हूँ सब पा लूँ,

स्वयं को बड़ी नदी से मिला लूँ,

पर ये जीवन सुख का नही केवल,

दुख को भी सहूँगा करके हृदय प्रबल, 

बस मुझे सुख पर,ना इतना इतराने दो,

बहना है मुझे बहने दो ।

पर्वत का सीना चीर सकता हूँ,

बंजर पर हरियाली ला सकता हूँ,

मन मे विश्वास मेरे हो जब,

एक कर दूँ,क्या धरती क्या नभ,

बस मेरे इस विश्वास को ना झुकने दो,

बहना है मुझे बहने दो ।

रंजीता अशेष
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रूकती कहाँ है ज़िन्दगी 

देख रही थी रेलगाड़ी  की खिड़की से,

रास्तों को पीछे छूटते हुए,

नई सुबह की उम्मीद मे,

कितने ख्व़ाबों को टूटते हुए।

रूकती कहाँ है ज़िन्दगी, 

देख रेलगाड़ी को मंज़िल तक बढ़ते हरदफा, 

सीखा मैने जीवन का नया फलसफा,

मोह,माया,रूप,काया

सबको धरा का धरा पाया।

रूकती कहाँ है ज़िन्दगी, 

नए दोस्त, नए रिश्ते, नए नाते,

नए यात्री से गाड़ी मे आते जाते,

कुछ देर मुझ संग बातें करते,

फिर अपनी राह को आगे बढ़ते।

रूकती कहाँ है ज़िन्दगी, 

खूब मचाती शोर ऐसा,

पटरी पर रेलगाड़ी की थप थप जैसा,

कभी खुशी,कभी जश्न, कभी आँखे करती नम।

रूकती कहाँ है ज़िन्दगी, 

आखरी स्टेशन पर पहुँचकर,

फिर नए गंतव्य तक जाने की तैयारी, 

शरीर को छोड़ जैसे,

आत्मा का नए रूप को धरने की बारी।

© रंजीता अशेष

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