माँ अम्बे तू मुझमे समाई है 

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It’s real award

Happy to share with my blogger friends…received Aagman Gaurav Samman-2017 (award) for my active involvement in the group and poetry by Aagman literary group (Delhi).Thank you so much for believing in me😆

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Dream Date

If you ask me to,

imagine our first meet,

I would prefer to be prescient, 

to make it a perfect beat.

I would have brought,

the Taj from the Agra, 

and placed it near the shore,

where sea could touch its stairs,

and sand can rest on its door.

The season would be rainy,

with some snow and drizzling,

and sparkling crackers above,

to make the eve more sizzling.

You are looking smart  and charming,

wearing tuxedo,standing quite,

waiting for the music to start,

waiting for me anxiously,at night.

I am dressed in red designer saree,

looking scintillating and vivacious,

My diamond danglers just add to the moment,

which is so auspicious.

You touched me gently,

asked my hand for dance,

the music was soft and soothing,

it was the perfect time for romance.

You were continuously looking at me,

I was rejoicing with innocence,

you called me paragon of beauty,

 feeling warmth of our presence.

This was the dream date

which I don’t want to miss,

what,if Taj is not with us,

we are there for each other,

that’s the real bliss.

Ranjeeta Ashesh
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मै,तुम और एफ एम

वो एफ एम रेडियो जो तुमने 

मुझे तोहफे मे दिया, 

उस खुबसूरत फिल्मी आशिकी को, 

मैने अपने ख्वाबों मे जिया ।

कुछ तो बात थी उन गानो मे, 

कुछ तो जज्ब़ात थे, उन तरानो मे, 

चुपचाप सुनती रहती थी अंदाज़े बयां, 

ना जाने कब मुलाकात हुई फसानो मे ।

जब तुम उस गाने को एफ एम, 

संग गुनगुनाते थे, 

कितने हसीं लम्हों मे, 

हम खो जाते थे ।

कुछ ना समझा, कुछ ना जाना, 

बस गानो संग, दिल हुआ दिवाना, 

बिन बोले आँखो से करते बातें, 

तुम, मै, एफ एम और ये भीगी रातें । 
© रंजीता अशेष 

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‘सीता ‘ नाम है, नारी के स्वाभिमान का 

पुरातन काल मे त्याग और बलिदान का,

जीवन भर जिसने प्यार किया श्री राम को,

उस प्रभु के अस्तित्व, अभिमान का,

‘सीता’ नाम है,नारी के स्वाभिमान का।

स्वंवर कर ,वर चुनने वाली राजकुमारी थी,

उसकी स्वतंत्र सोच सब पर भारी  थी,

चुन श्रीराम को हकदार बनी आदर सम्मान का,

‘सीता’ नाम है, नारी के स्वाभिमान का ।

रावण के खौफ से बेअसर थी,

अपने राम को चाहती इस कदर थी,

पूरी लंका से बदला लिया अपने अपमान का,

‘सीता ‘ नाम है, नारी के स्वाभिमान का ।

उस धोबी के लांक्षण का जवाब थी,

क्रुद्ध हो,अग्नि से लेती हिसाब थी,

नाम नही बदनाम होने दिया कभी अपने राम का,

‘सीता’ नाम है, नारी के स्वाभिमान का ।

रंजीता अशेष
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हाँ माँ, मै आज भी रोती हूँ जब तन्हा होती हूँ 

तेरे आशियाने की रंगीन गलीचों मे,

मुझे फिर से भटकना है,

माँ तेरी बाहों के झूलों मे,

मुझे फिर से सिमटना है,

तेरी हर याद के मोती को माला मे पिरोती हूँ,

हाँ माँ,मै आज भी रोती हूँ जब तन्हा होती हूँ।

उस दिन, तुम मुझसे कुछ कहना चाहती थी 

मालूम है मुझे,तुम संग हमारे,रहना चाहती थी,

वो एक घण्टा भारी तुमपर पड़ गया,

समय भी क्यों क्रूर बनकर अड़ गया,

उस काली रात को सोच ,चैन से नही सोती हूँ,

हाँ माँ, मै आज भी रोती हूँ, जब तन्हा होती हूँ । 

तुम्हारी मुस्कुराहटों ने जीना सिखाया, 

तुमको कभी मैने चाँद तारों मे नही पाया,

तुम्हारा एक एक कण मै खुद मे जीती हूँ,

अपनी हर साँस से तुम्हारे सपने सीती हूँ,

माँ  तुम मुझमे हो,इस आस को मै संजोती हूँ,

हाँ माँ, मै आज भी रोती हूँ जब तन्हा होती हूँ ।

रंजीता अशेष
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