ढलती जाए ये शाम 

# प्यार # इंतज़ार

ये खूबसूरत बावरे बादलों की चाल,

सूरज की तपिश,बिखरे रंग जैसे गुलाल,

चाँद के आने की आहट नही है आम,

कब आओगे तुम,कि ढलती जाए ये शाम ।

आँखो मे काजल मैंने खूब लगाया,

हाथों मे कंगन मैने खनकाया, 

देख मुझे,मानो दर्पण भी शरमाया, 

सज सँवर तकती राह,निपटा कर सारे काम,

कब आओगे तुम,कि ढलती जाए ये शाम ।

तारों को इठलाते देखूँ ,

रात को मस्ताते देखूँ ,

पवन की हर छुअन,मे तुमको आते देखूँ ,

हर पल लबों पर रहता एक ही नाम,

कब आओगे तुम, कि ढलती जाए ये शाम ।

© रंजीता अशेष
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