अजनबी 

दरदरी पीसी दाल की तरह,

वो कितनी परतें खोल गया,

एक अजनबी अन्जाने मे ही,

कितनी गहरी बातें बोल गया।

 

कभी कभी जरूरत पड़ जाती है,

बोझिल आँखों मे भी शरारत भर जाती है,

मासूम सा खोया बचपन मेरा जैसे डोल गया,

वो अंजाने मे ही,कितनी गहरी बातें बोल गया।

 

रास्तों पर यूँ ही तन्हा सा मन लगता है,

कई बार बीते लम्हों को ये तरसता है,

अपनी मीठे अल्फ़ाज़ से,वो मिश्री जैसे घोल गया,

वो अंजाने मे ही,कितनी गहरी बातें बोल गया ।

रंजीता अशेष

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23 thoughts on “अजनबी 

  1. दरदरी पीसी दाल की तरह,
    वो कितनी परतें खोल गया—-क्या शब्द का इस्तेमाल किया है—–शानदार।

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