धरा

poem on WORLD EARTH DAY

ये मेरी धरा है,मेरी जननी,मेरी माँ है,

कोई इसके जैसा पवित्र और पावन कहाँ है,

प्यार से सींचा उसने सबको,

चाहे हम हो,चाहे वन हो या हो अन्य प्राणी,

अपने लोभ मोह मे फँसकर,

क्यों ए इंसान,कर दी तूने नादानी।

 

उस माता से छल किया,

जिसने तुझको बल दिया ,

अपनी आँखे बंद कर तूने,

उसको कितना निर्बल किया ।

 

रोती रही,बिलखती रही,

उसको प्रदूषण की  भेंट चढ़ा दी,

धूएँ और आगजनी से,

उसकी साँसे तुमने सुलगा दी।

 

अब और ना उसको तुम आज़माओ,

त्रस्त धरा को जीने लायक  बनाओ,

अपनी माँ की ममता का ऋण  चुकाओ,

उसका खोया हुआ मान सम्मान अब तो लौटाओ।

 

© रंजीता अशेष

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