चाँद की चाँदनी 

चाँद की शरारत देखते ही बनती है,

उसकी मदभरी करामात देखते ही बनती है,

ऐसी चाँद की मदहोश चाँदनी मे,

तुम्हारी चाहत देखते ही बनती है ।

 

उसकी रौशनी मानो नहला रही हो,

उसकी चमक मानो बहला रही हो,

ऐसी चाँद की छू लेने वाली सादगी मे

तुम्हारे कदमो की आहट देखते ही बनती है ।

 

उसका बादलो मे बिन बोले छिप जाना,

उसका तारो संग इठलाना मस्ताना

ऐसी चाँद की अलबेली शाम मे,

तुम्हारी आँखो की खामोशी देखते ही बनती है ।

 

उसका घटाओं से डर जाना ,

सुबह होते ही धरा से मुकर जाना ,

ऐसी चाँद की अनछुई चाँदनी मे,

तुम्हारी बेपनाह मोहब्बत देखते ही बनती है ।

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